
महात्मा गांधी (2 अक्टूबर 1869 – 30 जनवरी 1948) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने सत्याग्रह, अहिंसा और सविनय अवज्ञा को राजनीतिक संघर्ष के प्रमुख साधनों के रूप में विकसित और प्रयोग किया। दक्षिण अफ्रीका के संघर्षों से लेकर चंपारण, असहयोग, दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन तक उनका राजनीतिक जीवन कई जन आंदोलनों से जुड़ा रहा।महात्मा गांधी की जीवनी आज भी भारत ही नहीं, सारी दुनिया के लिए एक प्रकाश स्तंभ है।
महात्मा गांधी का जीवन परिचय देना आसान नहीं है क्योंकि उनके जीवन की हर घटना महत्वपूर्ण है और कोई न कोई सीख जरूर देती है। भारत के इतिहास में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का नाम केवल एक राजनेता के रूप में अंकित नहीं है बल्कि वे एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने पूरे देश को आत्मबल और स्वाभिमान जैसी शक्तियों से प्रेरित किया।
जब सारा विश्व यह मानता था कि किसी भी बड़ी शक्ति को केवल ताकत और तलवार के बल पर ही झुकाया जा सकता है, तब इस दुबले पतले से दिखने वाले इंसान ने अहिंसा(Non-Violence), सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा(Civil Disobedience) को हथियार बनाकर ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें उखाड़ दी। गांधी जी का जीवन कोई सामान्य जीवन नहीं था बल्कि इसे सत्य की खोज में किए गए अनवरत प्रयोगों की एक श्रृंखला कहा जा सकता है।महात्मा गांधी और अहिंसा एक दूसरे के पूरक थे और ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी और सत्याग्रह का दर्शन भी स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य प्रेरक था ।
महात्मा गांधी की जीवनी में दुनिया की हर समस्या का समाधान निहित है फिर वह शस्त्रीकरण हो,युद्ध हो या आतंकवाद।उनकी जीवनी को आत्मसात करके भौतकतावाद की चकाचौंध के नकारात्मक प्रभावों को दूर करके सादगीपूर्ण जीवन शैली को अपनाया जा सकता है। महात्मा गांधी की जीवनी हर व्यक्ति को अवश्य पढ़नी चाहिए क्योंकि दुनिया की हर छोटी-बड़ी समस्या के समाधान का रास्ता यहीं से गुजरता है।
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात राज्य के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। वे पोरबंदर रियासत के दीवान थे जिन्हें लोग कबा गांधी(Kaba Gandhi) भी कहते थे। वे बड़े सत्यनिष्ठ, दृढ़निश्चयी और न्यायप्रिय थे। गांधी जी की माता पुतलीबाई (Putlibai) अत्यंत सरल और धार्मिक स्वाभाव की महिला थी।
उनका अधिकांश समय पूजा-पाठ और उपवास में ही बीतता था। माता के इसी त्याग और शुद्ध सात्विक जीवन का गहरा प्रभाव बालक मोहनदास के कोमल मन पर भी पड़ा।
बचपन में मोहनदास बहुत ही शर्मीले स्वभाव के थे। स्कूल में भी वे अपने काम से काम रखते थे और छुट्टी होते ही सीधे घर लौट आते थे। दूसरे बच्चों की गपशप और खेलकूद में उनका मन नहीं लगता था।
इसी उम्र में उन्होंने दो नाटक देखे थे - श्रवण पितृभक्ति और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र। इन दोनों नाटकों ने उन्हें बहुत गहराई से प्रभावित किया। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा के बारे में जानकर उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि चाहे प्राण चले जाएं लेकिन सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ना है।
उस समय बाल विवाह की प्रथा थी और इसीलिए वर्ष 1883 में जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, उनका विवाह पोरबंदर के व्यापारी गोकुलदास कपाड़िया की सुपुत्री कस्तूरबाई (कस्तूरबा कपाड़िया) के साथ हो गया। कस्तूरबा (Kasturba) उनसे उम्र में 6 महीने बड़ी थी लेकिन थे तो दोनों बच्चे ही। कस्तूरबा ने जीवन में हर मोड़ पर...चाहे आश्रम हो या जेल...गांधी जी का साथ पूरी निष्ठा से निभाया और वे पूरे देश की आदरणीया 'बा' कहलाईं।
बचपन में ही गांधी जी ने राम नाम का महत्व भी जाना। बचपन में जब उन्हें एक दिशा से सांप के आने का डर, एक दिशा से भूत के आने का डर और एक दिशा से किसी चोर के आने का डर सताता था, तब राम नाम जपकर ही उनका डर दूर भागता था।
इससे उनका यह विश्वास प्रबल हुआ कि किसी भी तरह के डर से मुक्ति पाने का एकमात्र मंत्र राम नाम है। बचपन में ही कुछ घटनाओं से गांधीजी ने यह भी सीखा कि अपनी गलती मान लेने से अच्छा कुछ नहीं होता।
1887 में मैट्रिक पास कर लेने के पश्चात गांधी जी भावनगर के कॉलेज में पढ़ने गए लेकिन वहां उनका मन नहीं रमा। काफी सोच विचार के बाद उन्होंने वकालत की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने का फैसला गया। उस जमाने में समुद्र यात्रा से विदेश जाना जाति बिरादरी में बहुत गलत माना जाता था।
मां पुतलीबाई को भी डर था कि कहीं विदेश जाकर उनका बेटा मांस, मदिरा का व्यसनी ना हो जाए। गांधी जी ने अपनी मां को तीन वचन दिये कि वे पराई स्त्री, मदिरा और मांस से हमेशा दूर रहेंगे। इसके बाद उन्हें विदेश जाने की अनुमति मिली।
वर्ष 1888 में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए लेकिन वहां के खान-पान और वातावरण से प्रभावित हुए बिना उन्होंने मां को दिए वचन हर हाल में निभाये। शाकाहारी भोजन ढूंढने के लिए वे मीलों चले लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
वहां की ठंड, खानपान और अंग्रेजी तौर तरीके उनके लिए एकदम नए और कठिन थे। मां को दिया वचन उन्होंने हर हाल में निभाया और शाकाहारी भोजन ढूंढने के लिए मीलों पैदल चले। इसी दौरान वे लंदन वेजिटेरियन सोसाइटी (London Vegetarian Society) से जुड़े और शाकाहार के महत्व को समझा।
वे गीता के कर्म योग और निष्काम भाव से बहुत प्रभावित थे। इन सिद्धांतों ने उन्हें एक नई रोशनी दिखाई। गीता उनके लिए कभी भी एक धार्मिक पुस्तक मात्र नहीं रही बल्कि संकट के हर क्षण में उन्हें सही राह दिखाने वाली सबसे बड़ी साथी बन गई इसीलिए वे गीता को 'गीता माता' (Geeta Mata) कहते थे। वर्ष 1891 में उन्होंने बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की और भारत लौट आए।
भारत लौट कर उन्होंने मुंबई और राजकोट में वकालत शुरू की पर शर्मीले स्वभाव के कारण वे अदालत में जिरह नहीं कर पाते थे। एक बार तो अदालत में बहस करते समय वे इतना घबरा गए कि खड़े ही नहीं रह सके और अपनी फीस लौटाकर चुपचाप बाहर आ गए। ऐसे में वे अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित थे तभी 1893 में गुजरात के एक व्यापारी दादा अब्दुल्ला (Dada Abdullah) ने उन्हें दक्षिण अफ्रीका में अपने एक मुकदमे के सिलसिले में एक साल के लिए वहां बुलाया। गांधीजी इसके लिए तैयार हो गए और समुद्री रास्ते से दक्षिण अफ्रीका पहुंच गए।
दक्षिण अफ्रीका पहुंचते ही गांधी जी का सामना एक कड़वे सत्य से हुआ। वहां के गोरे शासक भारतीयों और काले लोगों के साथ भेदभाव कर रहे थे। एक दिन जब वे प्रथम श्रेणी का टिकट लेकर ट्रेन से डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे तब पीटर मेरिट्सबर्ग स्टेशन पर एक गोरे यात्री ने उन्हें उस डिब्बे में बैठे देखकर कड़ा ऐतराज जताया। रेलवे कर्मचारियों ने गांधी जी से सीधे तीसरे दर्जे में जाने को कहा। गांधी जी ने जब तर्क दिया कि उनके पास सही टिकट है इसलिए वे डिब्बे से नहीं उतरेंगे तो इस पर एक पुलिस वाले ने उनका सामान डिब्बे से बाहर फेंक दिया और गांधी जी को धक्के मार कर ट्रेन से नीचे उतार दिया।
कड़कड़ाती सर्दी की उस रात में गांधी जी स्टेशन के प्रतीक्षालय में बैठे रहे। ठंड से भले ही उनका शरीर कांप रहा था पर मन में एक ज्वाला धधक रही थी। वे चाहते तो अपमान का घूंट पीकर भारत लौट सकते थे लेकिन उन्होंने तय किया कि वे परिस्थिति से भागेंगे नहीं बल्कि इस अन्याय और रंगभेद के खिलाफ डटकर मुकाबला करेंगे।
गांधी जी ने वहां के सभी भारतीयों को संगठित किया और 1894 में नटाल इंडियन कांग्रेस (Natal Indian Congress) बनाई ताकि लोग अपने हक के लिए आवाज उठा सकें। 1904 में उन्होंने फ़ीनिक्स आश्रम (Phoenix Ashram) बसाया जहां सब मिलकर काम करते थे और सादा जीवन जीते थे।
1906 में जब वहां की सरकार ने भारतीयों के अंगूठे के निशान का अनिवार्य करने का काला कानून बनाया तब गांधी जी ने जोहांसबर्ग में एक बड़ी सभा बुलाई। यहीं पर उन्होंने अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का पहला सार्वजनिक शंखनाद किया। लोगों ने मार सही, जेल गए लेकिन वे अन्याय के आगे झुके नहीं। लियो टॉलस्टाय से प्रेरित होकर उन्होंने 1910 में टॉलस्टॉय फॉर्म (Tolstoy Farm) की स्थापना की, जहां बच्चों और जवानों को आत्मनिर्भरता सिखाई जाती थी। 21 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद आखिर अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा और भारतीयों पर लगे कई काले कानून हटाए गए। दक्षिण अफ्रीका की लंबी लड़ाई ने सीधे-साधे मोहनदास को एक निडर नेता के रूप में रूपांतरित कर दिया।
जनवरी 1915 में जब वे भारत लौटे तो मुंबई बंदरगाह पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale) ने उन्हें एक बहुत बड़ी सीख दी। उन्होंने कहा कि देश के लिए काम करने से पहले देश को समझना होगा और इसीलिए एक साल तक गांधी जी ने भारत भ्रमण किया। उन्होंने देखा कि भारत गांवों में बसता है। इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे आश्रम बनाया ताकि देशसेवा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली तैयार की जा सके।
इसके बाद 1918 में अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों को प्लेग बोनस दिलाने के लिए गांधी जी ने मिल मालिकों के खिलाफ अपनी पहली भूख हड़ताल की जिसके बाद मालिकों को वेतन बढ़ाना पड़ा।
1918 में ही गुजरात के खेड़ा में सूखा पड़ने के बावजूद जब किसान अंग्रेजों को लगान देने के लिए मजबूर थे तब गांधी जी ने और वल्लभभाई पटेल ने किसानों को लगान ना देने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया और अंग्रेज सरकार को झुककर लगान माफ करना पड़ा। इन सफलताओं ने गांधी जी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया।
1919 में अंग्रेजों ने रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act) पास किया जिसके अनुसार किसी भी भारतीय को मात्र संदेह के आधार पर बिना मुकदमा चलाए जेल भेजा जा सकता था। इसे 'काला कानून' कहा गया।
इसी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए मासूम लोगों पर अंग्रेज अफसर जनरल डायर ने बेदर्दी से गोलियां चलवा दी। इस दर्दनाक नरसंहार ने गांधी जी को अत्यंत व्यथित किया और उन्हें समझ में आया की दुष्ट हुकूमत के साथ सहयोग करना सबसे बड़ा पाप है।
1920 में उन्होंने असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) शुरू कर दिया। देखते ही देखते पूरा देश उनके साथ उठ खड़ा हुआ। वकीलों ने वकालत छोड़ दी, छात्रों ने स्कूल छोड़ दिए और जगह-जगह विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। घर-घर चरखा चलता दिखाई देने लगा। खादी (Khadi) का पहनावा देश प्रेम का प्रतीक बन गया।
आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था पर तभी कुछ ऐसा घटा कि आंदोलन पर गहरा आघात हुआ। फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा नामक स्थान पर कुछ भड़के हुए लोगों ने एक थाने में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिस कर्मी जिंदा जल गए। अहिंसक आंदोलन में हिंसा गांधी जी को बर्दाश्त नहीं हुई और बिना किसी की परवाह किए उन्होंने आंदोलन वापस ले लिया। बहुत से शीर्ष नेताओं ने इसका विरोध किया मगर गांधी जी अहिंसा के संकल्प पर दृढ़ थे और ये मानते थे कि आजादी अगर हिंसा से मिलेगी तो वह टिक नहीं पाएगी।
इसके बाद 1930 में अंग्रेजों ने दैनिक जरूरत के नमक पर भी जब भारी टैक्स लगा दिया तब गांधी जी ने दांडी यात्रा की। 12 मार्च को अपने साबरमती आश्रम से वह 78 अनुयायियों के साथ पदयात्रा पर निकले और लगभग 240 मील की दूरी तय करके 6 अप्रैल को दांडी के समुद्र तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने नमक कानून तोड़ा। गांधीजी के इस कदम ने अंग्रेजों को हिला दिया। परिणाम यह हुआ कि लाखों लोग जेल गए, आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया। महिलाओं ने शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों के बाहर धरने दिए। इस आंदोलन में महिला शक्ति भी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाने लगी।
इस एकजुट आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि वायसराय लॉर्ड इरविन को मजबूरन गांधीजी से बराबरी के स्तर पर बातचीत करनी पड़ी और गांधी जी गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) के लिए लंदन गए। जब अपनी सादा धोती में वे बर्किंघम पैलेस पहुंचे तो दुनिया दंग रह गई। यह था गांधी जी की सादगी का जादू जो अब सब के सिर चढ़कर बोल रहा था।
1942 में जब सारी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की आग में जल रही थी, गांधी जी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' कहा और भारत छोड़ो आंदोलन(Quit India Movement) शुरू किया। 'करो या मरो' (Do or Die) का नारा भी गांधीजी ने इसी आंदोलन में दिया था। 8 अगस्त की रात को प्रस्ताव पास हुआ और 9 अगस्त की सुबह भयभीत ब्रिटिश सरकार द्वारा गांधी जी समेत सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
गांधी जी को पुणे के आगा खां पैलेस (Aga Khan Palace) में कैद किया गया। इसी जेल में गांधी जी ने अपनी पत्नी कस्तूर बा और अपने निजी सचिव महादेव देसाई को सदा के लिए खो दिया। यह उनके लिए वज्राघात से कम नहीं था। उधर जनता में उत्साह का संचार हो चुका था इसीलिए कई जगहों पर जनता ने खुद इस आंदोलन को संचालित किया। हर तरफ देश भक्ति की भावना का ज्वार उठ रहा था। यह सब देखकर अंग्रेजों को समझ में आ गया था कि अब भारत में उनका टिकना संभव नहीं है।
15 अगस्त 1947 को देश ने स्वतंत्रता प्राप्त की लेकिन साथ ही भारत और पाकिस्तान के रूप में देश के दो टुकड़े भी हो गए।
गांधी जी के लिए भारत का विभाजन (Partition of India )गहरा सदमा था। जब दिल्ली में आजादी के जश्न मनाए जा रहे थे तब गांधी जी बंगाल के नोआखली और कोलकाता में नंगे पैर घूम रहे थे और हिंदू मुस्लिम दंगों को शांत करने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे थे। गांधी जी ने मानवता को ही सच्चा धर्म माना लेकिन कुछ कट्टरपंथियों को गांधी जी की यह दया और सच्चाई पसंद नहीं आई।
30 जनवरी 1948 को जब गांधी जी नई दिल्ली के बिड़ला भवन में रोज की तरह प्रार्थना सभा में जा रहे थे। तभी नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse ) नामक एक व्यक्ति ने सामने से तीन गोलियां उनके सीने में दाग दी। सत्य और अहिंसा के वीर प्रहरी महात्मा गांधी वहीं गिर पड़े और उनके होठों से अंतिम शब्द निकले - "हे राम"
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आंखों में अश्रु लिए देश को बताया कि हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है और हर तरफ अंधकार छा गया है। गांधी जी आज हमारे बीच देह रूप में नहीं हैं लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। महात्मा गांधी का जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान युगों-युगों तक याद रखा जाएगा । महात्मा गांधी के विचार कभी पुराने नहीं होंगे बस देश, काल और परिस्थिति के प्रकाश में उन्हें देखने और समझने की आवश्यकता है।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) ने सही कहा था कि आने वाली पीढ़ियां शायद ही यकीन कर पाएंगी कि हाड़-मांस ऐसा कोई पुतला कभी इस धरती पर चलता फिरता था। जब तक इस संसार में सत्य, शांति और प्रेम का अस्तित्व रहेगा, तब तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की यह महागाथा दुनिया को राह दिखाती रहेगी।
| आंदोलन | वर्ष | स्थान | मुख्य मुद्दा | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| चंपारण सत्याग्रह | 1917 | बिहार | नील की खेती | किसानों की शिकायतों की जांच |
| अहमदाबाद मिल संघर्ष | 1918 | गुजरात | मजदूरी | श्रमिक विवाद में गांधी की मध्यस्थता |
| खेड़ा सत्याग्रह | 1918 | गुजरात | लगान | राजस्व राहत की मांग |
| दांडी मार्च | 1930 | गुजरात | नमक कानून | सविनय अवज्ञा का विस्तार |
| भारत छोड़ो आंदोलन | 1942 | भारत | ब्रिटिश शासन का अंत | व्यापक जन आंदोलन |
प्रश्न: बापू को सबसे पहले राष्ट्रपिता कहकर किसने पुकारा था?
उत्तर: 6 जुलाई 1944 को आजाद हिंद रेडियो (Azad Hind Radio) से देश को संबोधित करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) ने उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहा था।
प्रश्न: गांधीजी को महात्मा की उपाधि किसने दी थी?
उत्तर: चंपारण में किसानों के हक की लड़ाई जीतने के बाद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) ने उनके सम्मान में उन्हें महात्मा की उपाधि दी थी।
प्रश्न: गांधीजी और कस्तूरबा के कितने बेटे थे और उनके नाम क्या थे?
उत्तर: उनके चार बेटे थे जिनके नाम थे - हरिलाल (Harilal), मणिलाल (Manilal), रामदास (Ramdas) और देवदास (Devdas) थे।
प्रश्न: अहिंसक विचारों के प्रचार प्रसार के लिए गांधीजी ने कौन से मुख्य समाचार पत्र निकाले थे?
उत्तर: उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन (Indian Opinion) शुरू किया था और भारत लौटकर यंग इंडिया (Young India), नवजीवन (Navajivan) और हरिजन (Harijan) पत्र निकाले।
प्रश्न: गांधीजी की उस प्रसिद्ध किताब का क्या नाम है जिसमें उन्होंने स्वराज की बात रखी थी?
उत्तर: 1909 में समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी मूल भाषा गुजराती में हिंद स्वराज (Hind Swaraj) नाम की विचारोत्तेजक किताब लिखी थी।
प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र संघ गांधीजी के जन्मदिन को किस रूप में मनाता है?
उत्तर: संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने वर्ष 2007 में घोषित किया कि प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस (International Day of Non-Violence) के रूप में मनाया जाएगा।
प्रश्न: गांधीजी के राजनीतिक गुरु कौन थे?
उत्तर: गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले थे।
प्रश्न: दक्षिण अफ्रीका के युद्ध में गांधीजी ने किस रूप में सेवा दी थी?
उत्तर: बोअर युद्ध (Boer War) के समय उन्होंने घायलों की मदद के लिए भारतीयों का एक दल बनाया जिसे इंडियन एम्बुलेंस कोर (Indian Ambulance Corps) कहा गया। इस काम के लिए उन्हें केसर ए हिंद (Kaisar i Hind) पदक मिला था।
प्रश्न: गांधीजी ने अपना केसर ए हिंद पदक अंग्रेजों को क्यों लौटाया था?
उत्तर: जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू करने के साथ ही यह पदक सरकार को वापस भेज दिया था।
प्रश्न: बापू का पसंदीदा भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिये' किसने रचा था?
उत्तर: यह सुंदर और प्रेरणादायक भजन पंद्रहवीं सदी के विख्यात गुजराती संत और कवि नरसिंह मेहता (Narsinh Mehta) ने लिखा था।
प्रश्न: क्या गांधीजी कभी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे थे?
उत्तर: हां, उन्होंने सिर्फ एक बार वर्ष 1924 में कर्नाटक के बेलगाम (Belgaum) में आयोजित 39वें राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता संभाली थी।
प्रश्न: साबरमती आश्रम के अलावा गांधीजी ने महाराष्ट्र में कौन सा आश्रम स्थापित किया था?
उत्तर: उन्होंने 1936 में महाराष्ट्र के वर्धा के पास सेवाग्राम आश्रम (Sevagram Ashram) बसाया।
प्रश्न: इतिहास में चर्चित पूना पैक्ट असल में क्या था?
उत्तर: वर्ष 1932 में यरवदा जेल (Yerwada Jail) में आमरण अनशन के बाद दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर गांधीजी और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) के बीच पूना पैक्ट (Poona Pact) समझौता हुआ था।
प्रश्न: गांधीजी को कितनी बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था?
उत्तर: उन्हें 1937 से 1948 के दौरान कुल 5 बार नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) के लिए नामांकित किया गया लेकिन यह पुरस्कार उन्हें कभी नहीं मिला।
प्रश्न: किन पश्चिमी लेखकों के विचारों ने गांधीजी के जीवन दर्शन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
उत्तर: वे जॉन रस्किन (John Ruskin) की पुस्तक अनटू दिस लास्ट (Unto This Last) और हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) के सविनय अवज्ञा संबंधी लेखों से बहुत प्रभावित थे।
प्रश्न: गांधीजी का समाधि स्थल कहां है और उस पर क्या लिखा हुआ है?
उत्तर: दिल्ली में यमुना के किनारे उनकी समाधि राजघाट (Raj Ghat) नाम से स्थित है, जहां काले संगमरमर के पत्थर पर उनके अंतिम शब्द हे राम (He Ram) लिखे हैं।
प्रश्न: गांधीजी ने अपनी आत्मकथा मूल रूप से किस भाषा में लिखी थी?
उत्तर: उन्होंने अपनी आत्मकथा 'सत्य ना प्रयोगो ' (Satya Na Prayogo) गुजराती भाषा में लिखी थी, जिसका बाद में उनके निजी सचिव महादेव देसाई ने अंग्रेजी में अनुवाद किया।
प्रश्न: बच्चों की शिक्षा के लिए गांधीजी ने कौन सी योजना बनाई थी?
उत्तर: वर्ष 1937 में उन्होंने बुनियादी शिक्षा की योजना पेश की जिसे नई तालीम (Nai Talim) या वर्धा शिक्षा योजना कहा गया, जिसमें हाथ के हुनर और मातृभाषा पर बल था।
प्रश्न: गांधीजी किस प्रसिद्ध उद्योगपति को अपना पांचवां बेटा मानते थे?
उत्तर: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रख्यात उद्योगपति जमनालाल बजाज (Jamnalal Bajaj) को गांधीजी ने अपने पांचवें पुत्र के रूप में स्नेह दिया था।
प्रश्न: गांधीजी ने केवल एक धोती और चादर पहनने का फैसला कब लिया था?
उत्तर: सितंबर 1921 में मदुरै (Madurai) यात्रा के दौरान देश के निर्धन किसानों की हालत देखकर उन्होंने आजीवन साधारण धोती और चादर में ही रहने का प्रण किया था।
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