
"सदियों की ठंडी-बुझी राख में सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घरघर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!"
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
15 अगस्त 1947 को जब भारत ने परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ते हुए स्वतंत्रता को अंगीकार किया तो लोगों ने आजादी की शीतल बयार को महसूस किया। हमने आजादी की कीमत को जाना- समझा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान को स्थापित किया।
स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) के अर्थ बहुत गहरे हैं। यह सिर्फ तिरंगा फहराने या राष्ट्रगान गाने का अवसर ही नहीं है बल्कि सबसे बड़ी शक्ति पर गर्व महसूस करने का दिन भी है जो भारतीय संविधान से देश के हर नागरिक को प्राप्त हुई है। यह शक्ति है मतदान का अधिकार (Right to Vote)। हमारे देश में भले ही विकसित देशों के मुकाबले काफी कुछ बाद में शुरू हुआ लेकिन बहुत सी बातों में हम अन्य देशों से आगे भी हैं।
जब हमारा भारत आजाद हुआ तो देश के हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के अपना नेता स्वयं चुनने का अधिकार प्राप्त हुआ। देश में मतदान का अधिकार (Right to Vote) मिलने से ही आजादी का सही अर्थ साकार हुआ।
इतिहास साक्षी है कि भारत में जब-जब जनता ने किसी भी रूप में राजनीति में सहभागिता निभाई है तब - तब क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, विकास की नई कहानियां लिखी गई है। इसी कड़ी में जब भारत के नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult franchise) प्राप्त हुआ तो यह कहानी और आगे बढ़ी और आज हम दुनिया के सबसे लोकतंत्र के रूप में खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। मतदान का अधिकार जन - जन की भारतीय लोकतंत्र के प्रति अगाध आस्था का प्रतीक है।
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में आम आदमी के पास शासन व्यवस्था में किसी भी तरह बोलने या फैसला लेने का कोई हक नहीं था। अंग्रेजी शासन के समय सरकार चलना तो बहुत दूर की बात है, किसी भी मामले में वोट देने का अधिकार बहुत कम लोगों के पास था। उस समय केवल वही लोग वोट डाल सकते थे जिनके पास बहुत जमीन जायदाद होती थी, जो भारी टैक्स भरते थे या जो बहुत पढ़े लिखे थे। आम गरीब आदमी, किसान और स्त्रियों को इस प्रक्रिया से पूरी तरह दूर रखा गया था।
वर्ष 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) के अंतर्गत भारत में प्रत्यक्ष चुनाव की एक बहुत सीमित शुरुआत हुई थी। अंग्रेजों ने वोट डालने के लिए अचल संपत्ति, बड़ा भू राजस्व और ऊंची शैक्षणिक योग्यता जैसी कठोर शर्तें रख दी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि उस समय देश की मात्र 3% आबादी को ही वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ। गरीब किसानों, मजदूरों और महिलाओं को पूरी तरह से इस प्रक्रिया से दूर रखा गया।
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1935 के भारत शासन अधिनियम के माध्यम से मताधिकार का दायरा कुछ बड़ा और यह 10 से 13% तक पहुंचा और इसी आधार पर 1937 में प्रांतीय चुनाव भी हुए लेकिन इसमें धर्म और जाति के आधार पर अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाकर सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति को बढ़ावा दिया गया।
उस समय निरक्षरता के कारण हर उम्मीदवार के नाम के आगे लोहे के अलग-अलग डिब्बे रखे जाते थे जिसमें सादे कागज डालने होते थे। इसमें निष्पक्षता और गोपनीयता की बहुत कमी रहती थी।
इन विकट परिस्थितियों में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने मन ही मन यह तय कर लिया था कि जब देश आजाद होगा तो देश की जनता को मूल अधिकार के रूप में मतदान का अधिकार सबसे पहले दिया जाएगा।
26 जनवरी 1950 को जब स्वतंत्र भारत का संविधान लागू हुआ तो हमारे संविधान निर्माता ने एक बहुत ही सुंदर निर्णय लिया। जहां उस समय पश्चिम के विचारक मानते थे कि भारत जैसे गरीब और अशिक्षित देश में सभी को वोट की छूट देना खतरनाक हो सकता है। वहीं भारत में इसे देश की जनता का प्राथमिक अधिकार माना गया। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी वंचित वर्गों और महिलाओं को यह अधिकार पाने के लिए दशकों तक लंबे आंदोलन चलाने पड़े थे लेकिन भारत के संविधान निर्माताओं ने देश की जनता को यह अधिकार बहुत सहजता के साथ प्रदान कर दिया।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के माध्यम से भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage in India) को अपनाया गया। शुरुआत में मताधिकार की आयु 21 वर्ष रखी गई थी। भारत के हर भारतीय नागरिक चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक वर्ग का हो, समान रूप से मताधिकार प्रदान किया गया।
यानी संविधान लागू होने के दिन से ही भारत के नागरिकों को मताधिकार प्राप्त हो गया था।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में प्रथम आम चुनाव (First Election in India after Independence)
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में चुनाव की तैयारी शुरू की गई। यह आसान नहीं था। कई पाश्चात्य विचारकों ने यह संदेह जताया कि भारत जैसे गरीब देश में जहां निरक्षरता हावी है, इतने बड़े स्तर पर चुनाव कराना लगभग असंभव ही है लेकिन भारत की जनता ने व्यवस्था का सहयोग किया और दुनिया के सामने एक बेमिसाल उदाहरण प्रस्तुत किया।
भारत में प्रथम आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच आयोजित किया गया था। भारतीय चुनाव प्रणाली का इतिहास (History of Indian Election System) सही मायने में यहीं से शुरू होता है।
1951 के इस चुनाव में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 17.3 करोड़ थी जिनमें 85% से अधिक लोग निरक्षर थे।
मतदाताओं की सुविधा के लिए चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को बैल, दीपक, ढोलक जैसे सरल चुनाव चिन्ह आवंटित किए।
दूर दराज के क्षेत्र में भी चुनाव की प्रक्रिया बाधित न हो इसीलिए दुर्गम पहाड़ियों, जंगलों और रेगिस्तानी इलाकों तक पोलिंग बूथ बनाए गए ताकि हर व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके।
प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन और उनकी टीम ने इस कार्य को जिस निपुणता से पूरा किया, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास (History of Indian Democracy) में एक सुनहरे अध्याय की तरह अंकित है।
हिमाचल प्रदेश के बर्फीले गांवों के चुनावी किस्से आज भी उदाहरण के तौर पर याद किए जाते हैं। कई डिग्री माइनस तापमान में जहां रास्तों पर बर्फ जमी होती थी, वहां भी मतदान का उत्साह देखते ही बनता था। लोग कहते थे ठंड तो हर साल आती है लेकिन चुनाव तो 5 साल में एक बार ही आएंगे। यह भावना साबित करती है कि भारत में लोकतंत्र की जीवंत विचारधारा अपनी जगह बना चुकी थी। मताधिकार के प्रयोग को एक पर्व की तरह माना जाने लगा था और आज भी माना जाता है।
भारत में वोटिंग की प्रक्रिया और चुनाव प्रणाली ने एक लंबा और प्रगतिशील सफर हर चुनौती को पार करके तय किया है।
1952 के पहले चुनाव से लेकर कई दशकों तक कागज के बैलट पेपर पर अपनी पसंद के प्रत्याशी के निशान पर मोहर लगाकर वोट दिया जाता था और उसे लोहे की पेटी में रख दिया जाता था इसके बाद मतों की गिनती में कई दिनों का समय लग जाता था।
61 व संविधान संशोधन मताधिकार से जुड़ी व्यवस्था में एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया। 1988 में हुए इस संशोधन में वोट देने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटकर 18 वर्ष कर दी गई और इस निर्णय ने देश की युवा आबादी को प्रत्यक्ष तौर पर सरकार चुनने की प्रक्रिया से जोड़ दिया।
आज जब कोई युवा अपना 18 वां जन्मदिन मनाता है तो यह सिर्फ वयस्क होने की खुशी नहीं होती, यह खुशी इस बात की भी होती है कि देश की सरकार चुनने में अब भागीदारी भी होगी।
मतदाता पहचान पत्र हाथ में आते ही युवाओं के चेहरे पर उत्तरदायित्व का अनोखा भाव नजर आता है।
1990 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग शुरू हुआ और 2004 के लोकसभा चुनाव तक आते-आते देश भर में ईवीएम के जरिए मतदान होने लगा। बाद में पारदर्शिता को और बढ़ाने के लिए वीवीपीएटी(VVPAT)मशीन भी जोड़ी गई जिससे मतदाता तुरंत यह देख सकता है कि उसका वोट कहीं गलत प्रत्याशी को तो नहीं चला गया।
भारत में मतदान सिर्फ एक दिन का कोई कार्यक्रम भर नहीं है बल्कि यह एक सांस्कृतिक सामाजिक उत्सव है जो राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से मनाया जाता है।
सुबह 6:00 से ही मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिलती है। राजस्थान के बाड़मेर जिले की बात हो या हिमाचल प्रदेश के किसी बर्फीले क्षेत्र की... हर तरफ एक सा उत्साह नजर आता है। मई की चिलचिलाती धूप या दिसंबर की कड़कड़ाती सर्दी के बीच भी लोगों की कतारें छोटी नहीं होतीं। महिलाएँ अपनी पारंपरिक पोशाक में समूह बनाकर लोकगीत गाती हुई वोट डालने पहुँचती हैं।
कतारों में व्हीलचेयर पर आते विशेष योग्यजन और दूसरों के सहारे पहुँचे बुजुर्गों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि नीली स्याही का वह निशान केवल एक पहचान नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्य को पूरा करने का सबसे बड़ा संतोष है।
अब तक के वोटिंग के आंकड़े दर्शाते हैं कि जैसे-जैसे देश की लोकतांत्रिक जड़ें गहरी होती गईं, वैसे-वैसे आम जन का अपनी वोट की शक्ति पर विश्वास बढ़ता चला गया।
यह अधिकार हर व्यक्ति को समाज में बराबरी और शासन व्यवस्था में आवाज प्रदान करता है। यह वह अधिकार है जिसके दम पर नागरिक सरकार बदल सकते हैं। लोकतंत्र में मताधिकार जनता के हाथ में एक ऐसी शक्ति है जो उसे सही का साथ देने और गलत के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित करती है, जो उसे ऐसी सरकार चुनने को प्रेरित करती है जो जनता के हित में काम करे।
मतदान का अधिकार (Right to Vote) जनता को यह अधिकार देता है कि वह बेहतर कार्य करने वालों को चुने और वादों पर खरे न उतरने वाले प्रतिनिधियों को पद से हटा दे।
मतदान केंद्र में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता, सब बराबर होते हैं। देश का सबसे समृद्ध नागरिक हो या साधारण कामगार, दोनों एक ही कतार में खड़े होते हैं और दोनों के वोट का मूल्य बिल्कुल बराबर 'एक' ही होता है।
नागरिक अपनी मूलभूत सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार संबंधी चिंताओं को वोट के माध्यम से ही सरकार के सामने प्रभावी ढंग से रखते हैं। जब नागरिकों को लगता है कि सरकार उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही तो उनके पास वोट के रूप में उसे बदलने का साधन होता है।
स्वतंत्रता दिवस हम सबके लिए अत्यंत गौरव का दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आजादी प्राप्त करने के लिए हमने कितना संघर्ष किया। कई बार यह देखा जाता है कि मतदान वाले दिन को लोग छुट्टी का दिन मान लेते हैं और मतदान करने के प्रति बिल्कुल उदासीन हो जाते हैं। वे नहीं जानते कि ऐसा करके वे कितनी बड़ी गलती करते हैं। यह उदासीनता उन संघर्षों और उस बलिदान के प्रति अन्याय है जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने हमारे लिए किया, उस भावना और परिश्रम की भी अनदेखी है जो हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण और राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्त की थी।
जब तक हर नागरिक मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचेगा तब तक लोकतंत्र सही मायने में सशक्त नहीं बन सकेगा। स्वतंत्रता दिवस पर हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि जब भी चुनाव का अवसर आएगा तो बिना किसी प्रलोभन और भय के हम अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। जब हर उंगली पर नीली स्याही का निशान दिखेगा, तभी लोकतंत्र की यह महायात्रा सच्चे अर्थों में अपनी मंजिल को प्राप्त कर सकेगी।
प्रश्न 1: भारत में मतदान का अधिकार कब मिला (When was the right to vote granted in India)?
उत्तर: 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ।
प्रश्न 2: भारत में पहला चुनाव कब हुआ था (When did the first election take place in India)?
उत्तर: भारत में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच आयोजित किया गया था।
प्रश्न 3: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) क्या है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि देश के प्रत्येक नागरिक को, जो 18 वर्ष की निर्धारित आयु पूरी कर चुका है, बिना किसी भेदभाव के एक वोट देने का पूर्ण अधिकार है।
प्रश्न 4: संविधान का कौन सा अनुच्छेद वोट देने का अधिकार देता है?
उत्तर: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 (Article 326) नागरिकों को वोट डालने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
प्रश्न 5: वोट देने की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कब की गई?
उत्तर: 1988 में 61वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई, जो 1989 से लागू हुई।
प्रश्न 6: देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त (First Chief Election Commissioner) कौन थे?
उत्तर: सुकुमार सेन स्वतंत्र भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जिन्होंने 1951-52 के चुनाव का संचालन किया।
प्रश्न 7: स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) और वोटिंग के अधिकार का क्या संबंध है?
उत्तर: स्वतंत्रता दिवस विदेशी शासन से मुक्ति की याद दिलाता है, जबकि मतदान का अधिकार उस आजादी का उपयोग कर अपनी सरकार स्वयं चुनने की शक्ति देता है।
प्रश्न 8: भारत में पहली बार ईवीएम (EVM) का इस्तेमाल कब हुआ था?
उत्तर: ईवीएम का पहली बार प्रयोग 1982 में केरल के पारूर विधानसभा क्षेत्र के 50 पोलिंग बूथों पर किया गया था।
प्रश्न 9: पूरे देश में ईवीएम से चुनाव कब कराए गए?
उत्तर: वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे भारत में पूर्ण रूप से ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था।
प्रश्न 10: वीवीपीएटी (VVPAT) मशीन क्या काम करती है?
उत्तर: यह मशीन वोट डालने के बाद एक पर्ची दिखाती है, जिससे मतदाता यह पुष्टि कर सकता है कि उसका वोट उसी प्रत्याशी को गया है जिसे उसने चुना है।
प्रश्न 11: ब्रिटिश काल में कितने प्रतिशत लोगों के पास वोट देने का अधिकार था?
उत्तर: गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत औपनिवेशिक काल में केवल 10 से 15 प्रतिशत धनी और शिक्षित लोगों के पास ही मताधिकार था।
प्रश्न 12: मतदान का अधिकार क्यों महत्वपूर्ण है (Why is the right to vote important)?
उत्तर: यह अधिकार आम नागरिकों को अपनी पसंद की सरकार चुनने और जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने की शक्ति देता है।
प्रश्न 13: क्या महिलाओं को आजादी के तुरंत बाद वोट का अधिकार मिला था?
उत्तर: हाँ, स्वतंत्र भारत में 1950 में संविधान लागू होते ही महिलाओं को पुरुषों के समान ही पहला चुनाव लड़ने और वोट देने का अधिकार मिला।
प्रश्न 14: राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters' Day) कब और क्यों मनाया जाता है?
उत्तर: प्रतिवर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1950 में भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना हुई थी।
प्रश्न 15: चुनाव आयोग (Election Commission) की स्थापना कब हुई थी?
उत्तर: भारतीय निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी।
प्रश्न 16: वोट डालने के लिए कौन-कौन से पहचान पत्र मान्य हैं?
उत्तर: वोटर आईडी कार्ड के अलावा आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट और फोटो युक्त बैंक पासबुक भी मान्य पहचान पत्र हैं।
प्रश्न 17: नोटा (NOTA) का बटन क्या होता है?
उत्तर: यदि मतदाता चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार से सहमत न हो, तो वह नोटा (None of the Above) का विकल्प चुन सकता है।
प्रश्न 18: पहले आम चुनाव में कितने प्रतिशत मतदान हुआ था?
उत्तर: 1951-52 के पहले आम चुनाव में लगभग 45.7 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था।
प्रश्न 19: क्या अनिवासी भारतीय (NRI) वोट डाल सकते हैं?
उत्तर: हाँ, 2010 से प्रवासी भारतीयों को भारत में पंजीकृत होकर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहकर वोट डालने का अधिकार दिया गया है।
प्रश्न 20: भारत में चुनाव किस कानून के तहत संचालित होते हैं?
उत्तर: भारत में चुनाव मुख्य रूप से लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधानों के तहत होते हैं।
प्रश्न 21: क्या वोट न डालने पर कोई कानूनी सजा या जुर्माना है?
उत्तर: नहीं, भारत में वोट डालना एक अधिकार और नागरिक कर्तव्य है, इसे अनिवार्य कानून नहीं बनाया गया है।
प्रश्न 22: डाक मतपत्र (Postal Ballot) से वोट कौन डाल सकता है?
उत्तर: सेना के जवान, चुनाव ड्यूटी में तैनात कर्मचारी और 85 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग या विशेष योग्यजन डाक मतपत्र का उपयोग कर सकते हैं।
प्रश्न 23: लोकतंत्र में एक वोट की क्या भूमिका होती है?
उत्तर: एक अकेला वोट किसी भी प्रत्याशी की हार-जीत तय कर सकता है और सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।